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» » » जीने_की_अदा_जाने!!

है दुनिया की कुछ परवा ,न कुछ अच्छा बुरा जाने
कोई समझे क़लंदर[1] उस को और कोई गदा[2] जाने

मदद से असलहों[3] की जो दुकां अपनी चलाता है
मुहब्बत, दोस्ती, एहसास, जज़्बा, फ़िक्र क्या जाने?

जिया जो दूसरों के वास्ते है बस वही इंसां
कि अपने वास्ते जीने को वो अपनी क़ज़ा[4] जाने

फ़राएज़[5] की जगह ऊँची न होगी जब तलक हक़ से
तो दुनिया भी तेरी बातों को गूंगे की सदा जाने

सऊबत[6] ज़िंदगी का हर सबक़ ऐसे सिखाती है
कि नादारी[7] में भी इंसान जीने की अदा जाने

नज़र में उन की गर मज़हब है इक शतरंज का मोहरा
तो फिर अंजाम कैसा, क्या, कहाँ होगा ख़ुदा जाने

वफ़ादारी ही जिस की ज़ात का हिस्सा रही बरसों
मगर ये क्या हुआ कि आज वो इस को सज़ा जाने

न जाने किस ज़माने में ’शेफ़ा’ वो शख़्स जीता है
जो ख़ुद्दारी[8], रवादारी[9], मिलनसारी, वफ़ा जाने!!
                                                            .जीने_की_अदा_जाने_/_इस्मत_ज़ैदी
शब्दार्थ:
  1. ऊपर जायें फ़क़ीर
  2. ऊपर जायें भिखारी, भिक्षुक
  3. ऊपर जायें हथियार
  4. ऊपर जायें मृत्यु, मौत
  5. ऊपर जायें कर्तव्य, फ़र्ज़, नमाज़
  6. ऊपर जायें कठिनता, कष्ट, दुश्वारी, पीड़ा, व्यथा, तकलीफ़
  7. ऊपर जायें ग़रीबी, दरिद्रता, मुफ़लिसी, निर्धनता
  8. ऊपर जायें स्वाभिमान, आत्मगौरव, आत्मसम्मान
  9. ऊपर जायें सहृदयता, उदारता

Unknown

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