बेइंतहा जरुरी नही, मुख़्तसर जो बह चले
अश्क़ों में हो शिद्दत तो, दो बूँद भी बहुत है
अश्क़ों में हो शिद्दत तो, दो बूँद भी बहुत है
ख़्वाब सी तलब नही, आब सी तड़प नही
बंजर ज़मीं के लिए तो, दो बूँद भी बहुत है
बंजर ज़मीं के लिए तो, दो बूँद भी बहुत है
झुलस रही है ज़िन्दगी, बिन पानी के यहाँ
सुकून दे जो रूह को तो, दो बूँद भी बहुत है
सुकून दे जो रूह को तो, दो बूँद भी बहुत है
बोल नही सकते, बेज़ुबां ये परिन्दे 'इरफ़ान'
पिला सको इन्हे पानी तो, दो बूँद भी बहुत है
पिला सको इन्हे पानी तो, दो बूँद भी बहुत है
