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» » एक ही जुबाँ

एक जैसे हम, इक फजा, एक ही जुबाँ
फिर इस दिल में फर्क आ गया कहाँ ॥
मिलता है संगीत, मिलते हैं रस्मों रिवाज
क्या सरहदें बनने से बंट जाता है जहाँ ॥
होती इक जैसी शाम, एक ही सुबह
फिर क्यों बदल गए वक्त दिल के अरमाँ ॥
चाहते तो हैं हम, गिराना ये दीवार
मगर लम्बे हैं, फासले - ए .दरमियाँ ॥
देख रही है रास्ता खामोश ये निगाहें
शायद कहीं झुक आए ये आसमाँ ॥
एक जैसे हम, इक फजा, एक ही जुबाँ
फिर इस दिल में फर्क आ गया कहाँ ॥
   

Unknown

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