मन्दिरों से माँग के, कुछ इबादतें ले आओ,
हवाओं से छीन के, कुछ शरारतें ले आओ....
है जमघट कातिलों का...... हर घर में यहाँ,
जाओ कहीं से,..थोड़ी हिफाजतें ले आओ....
सुना है, कल फिर उसे,...भूखा सोना पड़ा,
महलों से चुरा के,.. कुछ इनायतें ले आओ....
दबीं, कुचलीं, सिसकती,.. रोती, बिलखतीं,
जो लिखीं नहीं गईं,... वो इबारतें ले आओ....
मचल उठे,...लो आज फिर दिल के अरमाँ,
सुनो, बाजार से,. थोड़ी मोहब्बतें ले आओ....
बातों को अनसुना करके,..फेंक देता है वो,
सड़कों से उठा के, कुछ हिदायतें ले आओ....
दे देती है,......... बेगुनाहों को हर रोज सजा,
गुनाह खत्म हो...... ऐसी अदालतें ले आओ....
मंजर इस दुनिया के.... अब रास नहीं आते,
जाओ आसमाँ से हमारी रियासतें ले आओ....!!
